बार-ए-हयात उठाइए, तनहा उठाइए, ये बोझ आप से नहीं उठता, उठाइए! ताबिश देहलवी
प्यारी शायरी
चांद से चेहरे रंगीं आंचल चलते फिरते साए हैं
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दुआ तो जाने कौन सी थी जेहन में नहीं बस इतना याद है के दो हथेलियां मिली हुई थीं जिनमें एक मेरी थी और एक तुम्हारी परवीन शाकिर
याद आती हैं उसकी प्यार भरी बातें शब भर और सारे बदन में अमृत घोलती रहती हैं परवीन शाकिर
भोले से मोहब्बत कर बैठा, नादान था बेचारा, दिल ही तो है हर दिल से खता होती है, बिगड़ो न खुदारा, दिल ही तो है साहिर लुधियानवी
मुझे लिख कर कहीं महफूज़ कर लो तुम, तुम्हारी यादाश्त से निकलता जा रहा हूं मैं ... ✍🏻
मैं वो लड़की हूं जिस को पहली रात कोई घूंघट उठा के ये कह दे मेरा सब कुछ तेरा है, दिल के सिवा परवीन शाकिर
तुझ से मिलने की सर खुशी के साथ एक उदासी की लहर दिल में है खुश्क होती नहीं किसी मौसम ग़म की एक ऐसी नहर दिल में है सर-ख़ुशी – नशा, सुरूर, कैफ़, मस्ती ख़ुश्क – (पदार्थ) जिसमें से जल का अंश सूखकर बिलकुल निकल गया हो। सूखा। जैसे-खुश्क जमीन, खुश्क जलवायु परवीन शाकिर
किसी के वादे पे क्यों एतबार हमने किया न आने वालों का क्यों इंतजार हमने किया न वो हमारे हुए न हम अपने रहे मोहब्बतों का अजब कारोबार हमने किया साहिर लुधियानवी
कोई आहट,कोई आवाज,कोई चाप नहीं दिल की गलियां बड़ी सुनसान हैं, आए कोई परवीन शाकिर
हाय ये मजबूरियां, महरूमियां, नाकामियां इश्क आखिर इश्क है, तुम क्या करो हम क्या करें जिगर मुरादाबादी