जटिल हो रही यह धरा अनसुलझा सा आदमी है बन रही पहेली कठिन कौन इसमें शामिल कौन इसके काबिल है पृथ्वी मां की गोद में वह खेलता था निश्छल भाव लिए आज निर्द्वंद घूमता है मूंछों पर ताव दिए लोकभूमि की आह से गुजर गया मानव है वाह की लोलुपता में काट रहा उपवन वन है दुनिया है क्या स्वारथ की या कहूं यह साहूकारी है धूल धारा धर पावन रज आज क्यों हा हा कारी है।
सुविचारों का दरिया 😇
☀️ दरिया बनकर किसीको 🌤 डुबाने से बेहतर है, की जरिया बनकर किसीको 🌤 बचाया जाए ! ☀️ ⛈ ⛈ ⛈ ⛈ ⛈ ⛈ ⛈ ⛈ ⛈ ⛈ ⛈ बेस्ट सुविचार 💫 💫 🪐 😊 😊 😊 😜 😊 😍 😍 🤔 🤗 💪 💪 🤘 Contact -. 1- @Vaibhav100 2- @anshuman5555
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प्रकृति-मानव का एकीकरण हो गया है, चीन जापान के ममी की यह कल्पना है, जीवित मानव की पत्थर से यह आस है, पाषाण बोलेगा, इस मानव को आस है।
मैंने पिता के जवानी को बचपन से देखा है और अब देख पाता हूँ उनकी बुढ़ापा को अपनी भरी जवानी में वक्त के साथ सब कुछ कितना बदल गया 🥺 खैर!मैं जब भी उनके साथ होता हूँ मुझे बार बार लगता है कि मैं फिर से बचपन में चला गया हूँ ठीक उसी प्रकार जिस तरह एक पिता नन्हे बच्चे के साथ खेलते खेलते बचपन में चला जाता है मेरा यह बचपना भर देता है उनके मन को नई उमंगों से जैसे ठूंठ वृक्ष पर हरियाली छा जाती है और वहां पक्षियों का बसेरा हो जाता…
आशा, हर विनाश के मलबे में चिंगारी ढूँढ लेती है, भोर, अमावस की रातों के बाद फिर से खिलती है। भविष्य, अतीत के हर जख्म को सीने में छुपाता है, यह मौन समेटे सन्नाटा, कोलाहल को पास बुलाता है।
अपने हक़ का इतवार... ये कैलेंडर के पन्नों पर, छपा इक इतवार का दिन, महज़ एक छुट्टी नहीं होती, ये ठहर जाने की इज़ाजत है। यंत्र बन चुकी इस रफ़्तार में, धड़कनों को टटोलने की फुर्सत है। जब दफ्तर की मेज़ पर छूटे हुए कागज़, घर की चौखट पर मुस्कुराते हैं, और आईना बरसों बाद पूछता है— "कहो, कैसे हो?" थके हुए कंधों से जब, जिम्मेदारियों का बोझ सरकता है, तो याद आता है— कि धूल जमी उन पुरानी किताबों में, कोई अधूरा अफ़्साना अब भी…
रविवार की बारिश कुछ अलग सी होती है, ठहर जाती हैं बूँदें खिड़कियों पर, ये फूल ही नहीं हर चेहरा खिलाती है, महकते नहीं हैं खाली गुलशन बारिशों में, कुछ बारिशें घर-परिवार को भी महकाती हैं।
आँसुओं का बहना भी एक बारिश की तरह है, जैसे वह बेज़ार धरती को फिर से नमी देकर उस पर फूल खिला देती है, वैसे ही आँसू हमारे जीवन को जीवित रखते हैं, धो देते हैं वे सारे दुःख, निकाल देते हैं अंतर्मन में भरे उस विरह को, जो जीवन को मार देता है। और फिर जन्म देते हैं एक नए हौसले और प्रेरणा को, जो सँवार देते हैं जीवन उम्र भर के लिए।
"झिलमिलाती यादें" *** कभी-कभी कुछ छवियाँ ही यादें बनकर रह जाती हैं, और परछाइयों में अपनी नई-नई दुनिया बना जाती हैं। अकेलेपन में भी किसी के साथ होने का एहसास देती हैं, और कभी हज़ारों की भीड़ में भी हमें तन्हा कर जाती हैं। तन्हाइयों में नए-नए प्रतिबिंब उभरते चले जाते हैं, और हम उन्हीं सायों में जाने कहाँ खोते चले जाते हैं। कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जिनसे दूर जाना पड़ता है, फिर उन्हें अपने ही अंतर्मन में चुपके से…
🌿 माँ क्यों इतनी खामोशी है 🌿 **** *** सूखी जड़ के चेहरे पर, माँ की ममता-सी उदासी है, नन्हा बाँहों में लिपटा पूछे—माँ “क्यों इतनी खामोशी है?” जिस आँचल ने छाँव दी थी, वही आज बंजर लगता है, जिस जीवन ने गोद भरी थी, वह कोना सूना लगता है। नन्हा भी लिपटकर जड़ से जैसे, अपना दर्द सुनाता है, “माँ! तू ही बता, तेरा हरियाला संसार कहाँ जाता है?” पेड़ों को काटकर हमने, अपनी ही छाँव मिटाई है, धरती की सूनी आँखों में, अपनी तस्वीर दिखाई…
फिर खरीद लिया उसने एक आबरू अवारा फिरता जो रहा उम्रभर नहीं फिकर जिसको रही अपनी बोझ डाला गया सारा मां बाप पर नाजों से पली एक कली मुरझा गई अपनी दास्तान को घुँघट में ही छिपा गई अब रस्मों से बंधा बंधन निभाना था अपनी आँसुओं को मुस्कान तले दबा गई।